हाइड्रोजन ईंधन सेल: सरल भाषा में समझें

क्या हाइड्रोजन सच में भविष्य का ईंधन बन सकता है? हाइड्रोजन ईंधन सेल बिजली बनाते हैं, सीधे हवा के ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से — निकास में सिर्फ पानी निकलता है। इसे समझना उतना मुश्किल नहीं जितना लगता है और आज कई सेक्टर्स इसकी तरफ देख रहे हैं।

सबसे पहले, काम कैसे होता है। ईंधन सेल में हाइड्रोजन एनोड पर जाता है जहाँ से उसके इलेक्ट्रॉन अलग होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन बाहरी सर्किट से होकर गुजरकर बिजली देते हैं और फिर कैथोड तक पहुंचते हैं, जहाँ ऑक्सीजन के साथ मिलकर पानी बनता है। यह प्रक्रिया बैटरी जैसी है, पर ईंधन सेल में आप ईंधन (हाइड्रोजन) भरकर तुरंत फिर से चलते हैं।

मुख्य फायदे

हाइड्रोजन ईंधन सेल के कुछ ठोस फायदे हैं: उच्च एनर्जी डेंसिटी — यानी वजन के मुकाबले ज्यादा ऊर्जा; तेज रिफ्यूल टाइम — कुछ मिनटों में भर जाते हैं; शून्य उत्सर्जन जब हाइड्रोजन ग्रीन तरीके से बना हो; और लंबी दूरी की मोबिलिटी के लिए बेहतर विकल्प, खासकर भारी वाहनों में।

पर यह भी सच है कि हर जगह बैटरी से बेहतर नहीं है। छोटी दूरी और सस्ती लागत पर बैट्री EV अभी भी बेहतर रहते हैं। इसलिए हाइड्रोजन का सबसे बड़ा फायदा तब दिखता है जब रेंज, वजन या तेज रिफ्यूल जरूरी हो — जैसे ट्रक, ट्रेन, शिपिंग और इंडस्ट्रियल पावर बैकअप में।

चुनौतियाँ और समाधान

सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं: हाइड्रोजन उत्पादन की लागत, स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट की जटिलता, और फिलहाल सीमित इन्फ्रास्ट्रक्चर। आज अधिकांश हाइड्रोजन फोसिल ईंधनों से बनता है, जो ग्रीन नहीं माना जाता।

समाधान के रूप में ग्रीन हाइड्रोजन (renewable बिजली से इलेक्ट्रोलाइसिस) और ब्लू हाइड्रोजन (कर्बन कैप्चर के साथ) पर काम चल रहा है। इलेक्ट्रोलाइज़र की कीमतें घट रही हैं और पायलट प्रोजेक्ट्स बढ़ रहे हैं। स्टोरेज के लिए हाई‑प्रेशर सिलेंडर, लिक्विड हाइड्रोजन और मेटल-हाइड्राइड जैसे विकल्प हैं — हर एक का फायदा और लागत अलग है।

सुरक्षा के मामले में हाइड्रोजन थोड़ा अलग है: यह तेज़ी से फैलता है और अगर नमी‑किसी शर्तों में रिसाव हो तो जलन का खतरा होता है। पर उद्योग में मानक, सेंसर और वेंटिंग सिस्टम्स इसे मैनेज करने के तरीके विकसित कर चुके हैं।

भारत में क्या हो रहा है? सरकार ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसी नीतियाँ पेश की हैं और कई पायलट प्लांट व रेफ्यूलिंग स्टेशन्स प्लान में हैं। बिजली की सस्ती हरित आपूर्ति और स्थानीय इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण से लागत और तेज़ी से घट सकती है।

अगर आप सोच रहे हैं कि अभी निवेश करें या इंतज़ार — रियलिस्टिक तौर पर कुछ सेक्टर्स में अभी पायलट और फ्लीट‑लेवल अपनाने का समय है। भारी वाणिज्यिक वाहनों, दूरदराज के औद्योगिक पावर और ग्रिड‑बैकअप में जल्दी फायदे दिख सकते हैं।

आखिर में, हाइड्रोजन ईंधन सेल किसी एक टेक्नोलॉजी की जगह नहीं लेगा, पर यह कई जगह बैटरी और फॉसिल ईंधनों का मिक्स बदल सकता है। यदि आप तकनीक, रोजगार या नीति से जुड़े रुझान जानना चाहते हैं, तो हम ऐसे अपडेट्स लाते रहेंगे।

भारतीय सेना और इंडियन आयल का हरा, टिकाऊ परिवहन समाधान के लिए सहयोग 29 मई 2024

भारतीय सेना और इंडियन आयल का हरा, टिकाऊ परिवहन समाधान के लिए सहयोग

भारतीय सेना ने इंडियन आयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) के साथ हरे और टिकाऊ परिवहन समाधानों को शामिल करने के लिए सहयोग किया है। इस सहयोग के तहत, सेना को एक हाइड्रोजन ईंधन सेल बस मिली है, जो 37 यात्रियों को बैठा सकती है और 30 किलोग्राम हाइड्रोजन ईंधन के टैंक पर 250-300 किमी की प्रभावशाली माइलेज देती है।

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