सौर ग्रहण 2025 का आखिरी अध्याय: 21 सितंबर को नहीं दिखेगा भारत
bhargav moparthi
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मैं भारतीय समाचारों का एक अनुभवी लेखक और विश्लेषक हूं। मैं उदयपुर में रहता हूँ और वर्तमान में एक प्रसिद्ध समाचार पत्रिका के लिए कार्यरत हूं। मेरा विशेष क्षेत्र राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे हैं। मैं समाचार विश्लेषण प्रदान करने में माहिर हूँ और मुझे नई चुनौतियों का सामना करने में आनंद आता है।

5 टिप्पणि

  1. ಹರೀಶ್ ಗೌಡ ಗುಬ್ಬಿ ಹರೀಶ್ ಗೌಡ ಗುಬ್ಬಿ
    सितंबर 21, 2025 AT 22:03 अपराह्न

    भाई लोग, ये सौर ग्रहण का शोर-शराब अक्सर असली विज्ञान को धुंधला कर देता है। भारत में नहीं दिखेगा तो क्यों न इसे इग्नोर कर दिया जाए? NASA का डेटा तो ठीक है, पर स्थानीय लोग खुद को ख़ास समझते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे “ऐतिहासिक” इवेंट को सिर्फ़ सोशल मीडिया पर ही नाचते‑गाते देखना बेवकूफ़ी है। अगर आधे सूरज का ढँकना भी नहीं दिखता, तो फिर क्यों इतना hype?

  2. chandu ravi chandu ravi
    सितंबर 21, 2025 AT 22:13 अपराह्न

    ओह नहीं 😢, इतना बड़ा इवेंट हमें नहीं दिखेगा! लेकिन फिर भी दिल में एक छोटी‑सी उम्मीद रहती है 🌟। लाइव स्ट्रीम देख कर कम से कम कुछ तो अनुभव कर लेंगे, है ना?

  3. Neeraj Tewari Neeraj Tewari
    सितंबर 21, 2025 AT 23:26 अपराह्न

    जब हम आकाश में अंधेरे की एक चिह्न देखते हैं, तो यह सिर्फ़ भौतिक घटना नहीं, बल्कि मानव मन की अतीत‑भविष्य की झलक भी होती है। सौर ग्रहण का प्रत्येक अंश, सूर्य की ऊर्जावान लहरों को कुछ क्षणों के लिये रोकता है, जिससे हमें अंतरिक्ष के राज़ों में एक दृष्टि मिलती है। विज्ञान के अनुसार, इस अंशीय ग्रहण से सूर्य के कोरोनल मास इजेक्शन (CME) की जानकारी मिल सकती है, जो धरती पर मौसम विज्ञान को प्रभावित करती है। परन्तु इस बार हमारा भाग्य ऐसा लगता है कि हम इस दृश्य को सीधे नहीं देख पाएंगे, जो हमें एक दार्शनिक प्रश्न पूछता है: क्या हमारे ग्रह की परिधि तक सीमित होते हुए भी हम ब्रह्मांडीय घटनाओं को समझ सकते हैं? कई प्राचीन ग्रंथों में ग्रहण को शुद्धिकरण का समय माना गया है, पर आधुनिक विज्ञान इसे केवल प्रकाश‑छाया का खेल देखता है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि मानव संस्कृति ने हमेशा वही समझना चाहा है जो सितारों ने नहीं कहा। हमारे पूर्वजों ने ग्रहण के समय रात्रि‑जागरण, मन्त्र‑उत्सव और सामाजिक समानता के लिए अवसर बना लिया था। आज भी इंटरनेट के माध्यम से हम इस अंशीय छाया को किलियन लोगों के साथ साझा कर सकते हैं, जिससे एक नई डिजिटल सामुदायिक अनुभूति उत्पन्न होती है। इस प्रकार, भौतिक दृश्य न दिखने पर भी हम अपनी मानसिक इंद्रियों को प्रशिक्षित कर सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि इस अंशीय ग्रहण में सूर्य के केवल 85 % भाग ढँकेगा, जिससे सूर्य के कोरोना के किनारे की चमक स्पष्ट होगी। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम केवल चमकते भाग को ही महत्व देते हैं, जबकि बाकी अंश भी मायने रखता है। इस द्रष्टिकोण से, सौर ग्रहण हमारे अस्तित्व की जटिलता का एक रूपक बन जाता है। हम अपने जीवन में भी कई बार अंशीय अंधेरा देखते हैं, फिर भी पूरी तरह अंधा नहीं होते। यही हमारे विकास की राह है – अंशीय अंधेरे को स्वीकार कर प्रकाश की ओर बढ़ना। इस विचार को अपनाते हुए, इस ग्रहण को ऑनलाइन देखना भी एक आध्यात्मिक यात्रा हो सकती है, क्योंकि चेतना का विस्तार हमेशा भौतिक सीमाओं से परे होता है। अंत में, चाहे ग्रहण दिखाई दे या न दे, हमारा सवाल नहीं, बल्कि हमारी समझ ही हमें आगे ले जाएगी।

  4. Aman Jha Aman Jha
    सितंबर 22, 2025 AT 00:50 पूर्वाह्न

    सभी को नमस्ते, मैं इस बात से सहमत हूँ कि चाहे ग्रहण दिखे या न दिखे, इसे अनुभव करने के कई तरीके हैं। लाइव स्ट्रीमिंग के ज़रिये हम विदेशों में रह रहे दोस्तों के साथ एक साथ देख सकते हैं, जिससे एक नई दोस्ती भी बन सकती है। साथ ही, सुतक काल के बारे में चर्चा सुनकर लगता है कि हमें अपनी परंपराओं को समझदारी से अपनाना चाहिए, न कि अंधाधुंध। इस तरह के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलुओं को मिलाकर ही हम संतुलित दृष्टिकोण पा सकते हैं।

  5. Mahima Rathi Mahima Rathi
    सितंबर 22, 2025 AT 02:13 पूर्वाह्न

    सिर्फ़ ऑनलाइन देख लेना, खुद बाहर खेलने का मज़ा नहीं। 😒

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